प्राचीन भारत का इतिहास की महत्वपूर्ण बातें और पाषाण युग

Hello Friends! आज मै आपको प्राचीन भारत का इतिहास के बारे मे बताने जा रही हूँ

प्राचीन भारत का इतिहास कई हज़ारो वर्ष पूर्व का माना जाता है|

भारत उत्तर मे हिमालय तथा दक्षिण,पूरब और पश्चिम में समुद्र से घिरा हुआ है और उत्तर पश्चिम मे पर्वत-बाहु हिमालय की मुख्य श्रंखला को समुद्र के साथ जोड़ती है|

भारत के इतिहास मे सबसे प्रारंभिक सभ्यता वैदिक सभ्यता है| वैदिक सभ्यता का सम्बंध आर्यों के आगमन से है|

प्राचीन भारतीय इतिहास के साधन

भारत के इतिहास का पता हमे किन -किन साधनो से हुआ|आइये हम आगे जानते है-

साहित्य –

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प्राचीन साहित्य

पुराणों और महाकाव्यों मे इतिहास बीज के रूप मे सुरक्षित है| उसमे राजाओ का वर्णन है और उनके कुछ विशिष्ट कार्यो का भी उल्लेख पाये जटे है| इन पुस्तकों मे एतिहासिक घटनाओ और परम्पराओ के उल्लेख भी होते है| साहित्य के विभिन्न अंगो जैसे लौकिक एवं धार्मिक और पतंजलि के व्याकरण ग्रंथो से भी महत्वपूर्ण एतिहासिक सूचनाएँ मिलती है|

पुराणो और महाकाव्यों से एतिहासिक महापुरुषों के जीवन – चरित महत्वपूर्ण है और सौभाग्य से हमे अनेक जीवन – वृत उपलब्ध है जैसे – बाराभट्ट कृत – हर्षचरित , बिल्हग कृत विक्रमांकदेवचरित , संध्या करनन्दि कृत रामचरित ,नयचन्द्र कृत हम्मीरकाव्य, चंदरबरदाई कृत पृथ्वीराजचरित और पृथ्वीराजविजय आदि|

संस्कृत की तरह तमिल साहित्य भी दक्षिण भारत के इतिहास के लिए एक बहुमूल्य स्रोत है| कुछ दरबारी कवियों ने अपने आश्रयदाता राजाओ को ही अपने काव्यो का नायक बनाया है| इससे हमे साहित्य के द्वारा भारत के प्राचीनतम इतिहास तथा युद्धो की जानकारी प्राप्त होती है|

संस्कृत और तमिल साहित्य यदपि भारत की प्राचीन संस्कृति और सभ्यता का स्वरूप निर्धारण करने मे उपयोगी है, तथापि देश के इतिहास निर्माण मे पूरी तरह से सहायता नही करते है| जिसके फलस्वरूप उन्नीसवा शताब्दी तक इस दिशा मे हमारा ज्ञान बहुत ही अपूर्ण था|

उस समय अन्य प्रकार के प्रमाणो की सहायता से अनेक विद्वानो ने जिनमे अधिकांश योरोपीय थे , अपनी प्रतिभा , लगन एवं मेहनत से उसमे काफी वृद्धि की|इन नए प्रमाणो पर ही भारतीय इतिहास का हमारा आज का ज्ञान निर्मित हुआ है |

पुरातत्व –

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प्राचीन सिक्के

पुरातात्विक प्रमाण महत्वपूर्ण एवं प्रथम है क्योकि इससे भारतीय इतिहास को कई ज्यादा सहायता मिली है|इसके अंतर्गत सिक्के , अभिलेख एवं अन्य प्राचीन अवशेष आते है|

अभिलेख समसामयिक होने के कारण विश्वसनीय प्रमाण है और उनसे हमे राजाओ के नाम, कभी कभी उनकी तिथिया तथा अन्य आवश्यक विवरण भी प्राप्त हुए है| सिक्को मे कुछ और राजाओ के नाम सुरक्षित है और उनके राज्यो का पता लगता है | उनके जन – संस्कृति को समझने की एक ऐसी अन्तदृष्टि मिलती है जो केवल पुस्तकीय ज्ञान से संभव नही है|

तक्षशिला की खुदाई मे हमारे सामने प्राचीन भारत के नागरिक जीवन का ऐसा चित्र उपस्थित कर दिया है जो किसी पुस्तक से नहीं जाना जा सकता| कभी- कभी पुरातात्विक खुदाइयाँ सभ्यता से अज्ञात युगों को प्रकट करती है जैसे – सिंधु घाटी की सभ्यता |

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भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण

विदेशियों के वृत्तांत –

प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी के लिए हमे विदेशियों की बहुत सहायता मिली है| भारत के उल्लेख विदेशी अभिलेखो जैसे – दारयवहु (डेरियस) के अभिलेखो और विदेशी साहित्य जैसे हेरोदती के इतिहास मे हुए है किन्तु सबसे बड़ी बहुमूल्य देन तो उन विदेशियों की है जो इस देश मे आए थे|

सिकंदर के भारतीय अभियान के समय एवं उसके पश्चात भारतीय दरबार मे राजदूत के रूप मे आने वाले यात्री ने इस देश का विस्तृत विवरण लिखा है|

चीनी –

चीनी यात्री बहुत बड़ी संख्या मे धार्मिक पुस्तकों के संग्रह एवं बौद्धों तीर्थों की यात्रा करने भारत आए| उनमे से फ़ाहियान , ह्वेंसांग और इत्सिंग ने अपने समय मे महत्वपूर्ण वृतांत लिखे है|

भारतीय इतिहास का पाषाण युग –

पाषाण युग इतिहास का वह काल है जब मानव का जीवन पत्थरों (संस्कृत – पाषाणः) पर अत्यधिक आश्रित था। जैसे पत्थरों से शिकार करना, पत्थरों की गुफाओं बनाना , पत्थरों से आग पैदा करना इत्यादि।

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टेड़े मेड़े पत्थर

पाषाण युग 500,000 से 200,000 साल पहले हुआ था|इसके तीन चरण माने जाते हैं-

पुरापाषाण काल, मध्यपाषाण काल एवं नवपाषाण काल जो मानव इतिहास के आरम्भ (२५ लाख साल पूर्व) से लेकर काँस्य युग तक फ़ैला हुआ है। आइये इन युगो की जानकारी प्राप्त करते है –

पूरा पाषाण काल –

इस युग के मनुष्य सभ्यता अति आदिम अवस्था मे थे|वे धातुओ का उपयोग नही जानते थे और न खेती करने का ही उन्हे कुछ ज्ञान था | संभवत: वे आग जलाना भी नही जानते थे और वे पेड़ के फलो तथा पत्थर के हथियारो से मारे हुए पशुओ और मछलियो पर निर्वाह करते थे|

वे प्रकृतिक गुफाओ मे रहते थे और किसी प्रकार के मकान अथवा मकबरे आदि नही बनाते थे|

मध्य पाषाण काल –

पूरा पाषाण युग के बाद की संस्कृति को मध्य पाषाण युग (मैसोलीथिक एज) कहा जाता है| इस पाषाण युग के लोग क्वार्ट्जाईट के हथियार बनाते थे|इस युग के लोगो के हथियार कैल्सेडोनी और सिलिकेट पत्थरो जैसे जैस्पर , चर्ट और पिटोनोया (ब्लड स्टोन) के बने होते थे|

ये पत्थर के औज़ार अत्यंत छोटे थे लंबाई मे केवल एक इंच के बराबर थे और उनके बनाने का ढंग भी भिन्न था| इन औजारो का उपयोग करने वाले मनुष्य भी अपने पूर्वजो की भांति मुख्यत: शिकारी थे| वे जंगली जानवरो के शिकार पर निर्वाह करते थे , वे जंगली फल और कंदमूल खाते थे| आगे चलकर मिट्टी के बर्तन बनाना सीख गए थे|

नव पाषाण काल –

इसमे पूर्व युगो की तुलना मे औजारो की संख्या बढ़ गई जिसमे सेल्ट ,बसूले ,कुल्हाड़ी ,छेनिया, गदाये, मूसल,बाराग्र ,शल्कक ,आरिया ,आदि मुख्य थे| पत्थर के औज़ारो मे मुख्य रूप से महीन दानेदार गहरे रंग के ट्रेप का इस्तेमाल मिलता है|

इस युग के हथियारो के समूचे भागो अथवा किनारो पर पालिश के स्पष्ट चिन्ह पाये जाते ही यह बात पूर्व औजारो मे नही पायी जाती थी| उन्होने घर बनाए , पशुओ को पालतू किया और भूमि पर खेती भी की| उन्होने मिट्टी के बर्तन गढ़े और अपने मुर्दों के लिए समाधिया बनाई| वे चित्रकारी का भी कुछ ज्ञान उन्हे था|

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पत्थर से आग निकालने की कला

ताम्र एवं कांस्य युग –

संसार के अन्य देशो की ही भांति भारत मे भी नव पाषाण युग के बाद धातु का उपयोग करने वाली संस्कृति का युग आया| सबसे पहले तांबा या कांसे का ज्ञान हुआ | कांसा , तांबा और टीन मिलाने से बनता है|

तांबा और कांसा ही सर्वप्रथम ज्ञात होने वाली धातुए है|इनकी बनी कुल्हाड़िया , तलवारे , कटारे , हारपून और अंगूठियों के ढेर गंगा – यमुना के किनारे मुख्य रूप से पाये ज्ञे है| यह संस्कृति मुख्यत उत्तर भारत मे पनपी|

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औजारे

सामान्यत मान्यता है की लोहे का ज्ञान इस संस्कृति के बाद के युग मे हुआ उसे लौह युग के नाम से पुकारते है|

तो ये थी भारत का प्राचीन इतिहास का एक छोटा सा प्रारूप….

Deepshikha Gupta

Deepshikha Gupta likes to work as a blogger, she is more conscious in writing articles, she is a resident of Varanasi, she has more thinking power and is passionate about thought....

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